प्रेम

प्रेम हर स्थिति में केवल प्रेम ही होता है। हम इसको अलग-अलग संबंध के साथ विभाजित नहीं कर सकते। प्रेम हर संबंध में समान होता है। संबंधों के वैविध्य के साथ परिवर्तित होने वाला विशेष भाव चाहे कुछ भी हो, प्रेम नहीं हो सकता। माता के प्रति जो विशेष भाव है वो आदर हो सकता है, बहन के प्रति जो विशेष भाव है वो स्नेह हो सकता है, प्रेमिका के प्रति जो विशेष भाव है वो वासना हो सकती है, पुत्री के प्रति जो विशेष भाव है वो अनुराग हो सकता है। इन सबको एक ही अर्थ में नहीं समेटा जा सकता। ये सारे भाव संबंध-प्रति-संबंध बदलते रहते हैं, लेकिन प्रेम जहाँ भी होगा उतना ही विराट होगा, उतना ही भव्य होगा। प्रेम परमात्मा से घटित होगा तो भी उसका स्पंदन ठीक वैसा ही होगा जैसा प्रेमिका, माता, पिता, बहन या पत्नी के संबंध में! इसी कारण मीरा का प्रेम आध्यात्म हो गया। क्योंकि जहाँ प्रेम संबंधों की सीमाओं को पीछे छोड़ देता है वहाँ उसके साथ कोई विशेषण लगाने कि आवश्यकता ही नहीं रह जाती। वह स्वत: ही पावन हो जाता है, या यूँ कहा जाये कि प्रेम तो होता ही निश्छल है, इसी कारण उसको संबंधों की या सामाजिक परम्पराओं की कोई सीमा रेखा दिखाई ही नहीं देती। छोटे बालक की खिलखिलाहट की तरह प्रेम बिल्कुल पवित्र होता है....... अनहद नाद कि तरह...... विराट, किन्तु अदृश्य भी, इसको देखने के लिए स्वयं को भी उतना ही विराट बनाना पड़ता है। अंगुलियों से हिमगिरि को मापना कैसे संभव है???

3 comments:

मीनाक्षी said...

अति सुन्दर भाव !... इसलिए 'प्रेम ही सत्य है'

Udan Tashtari said...

गहरे भाव.

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर और गहरे भाव।